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«Сунан Абу Дауд». Хадис № 799



 

799 – حَدَّثَنَا الْحَسَنُ بْنُ عَلِىٍّ حَدَّثَنَا يَزِيدُ بْنُ هَارُونَ أَخْبَرَنَا هَمَّامٌ وَأَبَانُ بْنُ يَزِيدَ الْعَطَّارُ عَنْ يَحْيَى عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ أَبِى قَتَادَةَ عَنْ أَبِيهِ بِبَعْضِ هَذَا وَزَادَ فِى الأُخْرَيَيْنِ بِفَاتِحَةِ الْكِتَابِ. وَزَادَ عَنْ هَمَّامٍ قَالَ:

وَكَانَ يُطَوِّلُ فِى الرَّكْعَةِ الأُولَى مَا لاَ يُطَوِّلُ فِى الثَّانِيَةِ وَهَكَذَا فِى صَلاَةِ الْعَصْرِ وَهَكَذَا فِى صَلاَةِ الْغَدَاةِ.

قال الشيخ الألباني : صحيح

 

799 – Передают со слов ‘Абдуллаха ибн Абу Къатады, сообщившего со слов своего отца часть этого хадиса[1] и он[2] привёл дополнение:

«… а в двух других (рак’атах) он читал (суру) “Открывающая Писание”». 

И также он привёл дополнение от (одного) Хаммама, который сказал:

«И обычно он удлинял (чтение) в первом рак’ате, то, чего он не делал во время второго. Таким же образом он поступал при совершении послеполуденной молитвы/‘аср/, и то же самое (он делал) во время утренней молитвы».

Этот хадис передал Абу Дауд (799).

Шейх аль-Албани сказал: «Достоверный хадис/сахих/».[3]

Иснад этого хадиса достоверный в соответствии с условиями аль-Бухари и Муслима. См. «Сахих Аби Дауд» (3/386).

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Имам ан-Навави сказал:

– Во всех этих хадисах довод тому, что во всех рак’атах необходимо читать «аль-Фатиху». А Абу Ханифа не считал это обязательным, а выбирал между чтением, тасбихом и молчанием. Но большинство (учёных) на том (мнении), что чтение («аль-Фатихи») является обязательным, и это правильно, и соответствует достоверной Сунне. См. «Шарх Сахих Муслим» (4/175).


[1] См. хадис № 798.

[2] То есть, аль-Хасан ибн ‘Али, передавший со слов Язида, передавшего со слов Хаммама и Абана. См. «‘Аун аль-Ма’буд» (3/11).

[3] См. «Сахих Аби Дауд» (763).

 

 

 

عون المعبود

 

 

[ 799 ] ( ببعض هذا ) أي هذا الحديث المذكور انفا ( وزاد ) أي الحسن بن علي عن يزيد عن همام وأبان كليهما

( في الأخريين بفاتحة الكتاب ) وروى مسلم هذه الزيادة من طريق أبي بكر بن أبي شيبة عن يزيد بن هارون عن أبان وهمام
قال النووي في شرح صحيح مسلم:
في هذه الأحاديث كلها دليل على أنه لا بد من قراءة الفاتحة في جميع الركعات
ولم يوجب أبو حنيفة رضي الله عنه في الأخريين القراءة بل خيره بين القراءة والتسبيح والسكوت والجمهور على وجوب القراءة وهو الصواب الموافق للسنن الصحيحة
انتهى ( وزاد ) أي الحسن بن علي عن يزيد بن هارون ( عن همام ) وحده ( وكان يطول في الركعة الأولى ما لا يطول في الثانية

(3/11)

يطول بالتشديد من التطويل وما نكرة موصوفة أي يطول في الأولى إطالة لا يطيلها في الثانية أو مصدرية أي غير إطالته في الثانية فتكون هي مع ما في حيزها صفة لمصدر محذوف ( وهكذا في صلاة العصر وهكذا في صلاة الغداة ) فيه دليل على عدم اختصاص القراءة بالفاتحة وسورة في الأوليين وبالفاتحة فقط في الأخريين والتطويل في الأولى بصلاة الظهر بل ذلك هو السنة في جميع الصلوات
قال الحافظ تحت ترجمة البخاري باب يطول في الركعة الأولى: أي في جميع الصلوات وهو ظاهر الحديث المذكور في الباب
وعن أبي حنيفة يطول في أولى الصبح خاصة
وقال البيهقي في الجمع بين أحاديث المسألة يطول في الأولى إن كان ينتظر أحدا وإلا فليسو بين الأوليين
وروى عبد الرزاق نحوه عن بن جريج عن عطاء قال إني لأحب أن يطول الإمام الأولى من كل صلاة حتى يكثر الناس فإذا صليت لنفسي فإني أحرص على أن أجعل الأوليين سواء
وذهب بعض الأئمة إلى استحباب تطويل الأولى من الصبح دائما وأما غيرها فإن كان يترجى كثرة المأمومين ويبادر هو أول الوقت فينتظر وإلا فلا
وذكر في حكمة اختصاص الصبح بذلك أنها تكون عقب النوم والراحة وفي ذلك الوقت يواطئ السمع واللسان القلب لفراغه وعدم تمكن الاشتغال بأمور المعاش وغيرها منه والعلم عند الله
انتهى

 

 

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