1855 ( صحيح )
إنّ الله لا يَقْبَلُ صَلاةً بِغَيْرِ طُهُورٍ ولا صَدَقَةً مِنْ غُلُولٍ
( حم د ن ه حب ) عن والد أبي المليح .
«Поистине, Аллах не принимает молитву без очищения, и (не принимает) милостыню/садакъа/ с украденного трофея/гъулюль/[1]». Этот хадис передали Ахмад (5/74, 75), Абу Дауд (59), Абу ‘Авана в своём «Сахихе» (1/235), ад-Дарими (686), ат-Таялиси (1319), ан-Насаи (1/87), Ибн Маджах (271), Ибн Хиббан (1705), Ибн Абу Шейба (29), аль-Баззар (2329), ат-Табарани в «аль-Му’джам аль-Кабир» (505) со слов Абу Малиха[2] передавшего со слов своего отца[3]; имам Ахмад (2/19, 39, 51, 57, 73), Муслим (224), ат-Тирмизи (1), Ибн Маджах (272), Ибн Хузайма (8), Ибн Аби Шейба (26), аль-Байхакъи (1/42), Абу Я’ля (5614), ат-Табарани в «аль-Му’джам аль-Кабир» (13266) слов Ибн ‘Умара; Ибн Хузайма (9, 10) слов Ибн ‘Умара; Ибн Хузайма 9, 10 со слов Абу Хурайры, да будет доволен ими Аллах.
Шейх аль-Албани назвал хадис достоверным. См. «Сахих аль-Джами’ ас-сагъир» (1855), «Сахих Аби Дауд» (53), «Ирвауль-гъалиль» (120), «Мишкатуль-масабих» (301).
См. также хадис № 7384.
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Имам Ибн аль-Мунзир сказал: «Учёные мусульманской общины единогласны, что молитва недействительна, кроме как при омовении, если есть возможность его совершить». См. «аль-Аусат» (1/107).
От Ибн Мас’уда, да будет доволен им Аллах, сообщается, что Пророк, да благословит его Аллах и приветствует, сказал: «Было ниспослано повеление в отношении одного из рабов Аллаха, подвергнуть его наказанию в могиле, дав ему сотню ударов. Однако он не переставал умолять и просить пока, все удары не были заменены одним. И ударили его один раз, после чего его могила заполнилась огнем. Когда же он пришел в себя и поднялся, он спросил: “За что меня ударили?” Ему ответили: “Ты совершил одну молитву без омовения, и прошел мимо притесняемого, не оказав ему помощи!”» Этот хадис передал ат-Тахави (3/231). Хадис достоверный. См. «Сильсиля ас-сахиха» (2774).
Имам ан-Навави сказал: «Если человек совершил молитву без омовения, зная о том, что это запрещено, то он совершил великий грех. Однако, мы не считаем что он становится неверным, если только он не счёл подобное действие дозволенным. А Абу Ханифа считал, что такой человек становится неверным за издевательство над религией». См. «Раудату-т-талибин» (10/67) и «аль-Маджму’» (2/84).
[1] Имам ан-Навави сказал: «Гъулюль – это кража военного трофея до того, как он будет распределен между участниками сражения. См. «Шарх Сахих Муслим» (3/103).
[2] Абу Малих – ‘Амир ибн Усама ибн ‘Умайр. Говорят также, что его звали Зайд ибн ‘Амир ибн ‘Умайр ибн Хунайф ибн Наджих Абу Малих аль-Хузали. Он передавал хадисы со слов своего отца, Бурайды ибн аль-Хусайба, ‘Абдуллы ибн ‘Амра, Джабира, Му’авии, Анаса, Василы ибн аль-Аскъа’ и др. От него передавали Абу Къилаба, Аййюб ас-Сахтияни, Къатада и др. Абу Зур’а сказал о нём: «Басриец, заслуживающий доверия». Скончался в 112 г.х[2]. См. «Б. аль-‘Айни, «Шарх Сунан Абу Дауд» 1/179.
[3] Усама ибн ‘Умайр ибн ‘Амир ибн аль-Аштар аль-Хузали аль-Басри — отец Абу Малиха. От него передавал хадисы только его сын. Его хадисы приводили Абу Дауд, ат-Тирмизи, ан-Насаи и Ибн Маджах[3]. См. «Б. аль-‘Айни, «Шарх Сунан Абу Дауд» 1/179.
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شرح الحديث
التخريج : من أفراد مسلم على البخاري
كانَ الصَّحابةُ رَضيَ اللهُ عنهم يَنصَحونَ النَّاسَ بما يَنفَعُهم في الدِّينِ والدُّنيا، ويَنصَحون كلَّ إنسانٍ بما يُناسِبُ حالَه من المَقالِ وبما يَعقِلُه، وقد كان عبدُ اللهِ بنُ عامِرِ بنِ كُرَيزٍ أميرًا على البَصرةِ للخَليفةِ عُثمانَ بنِ عَفَّانَ رَضيَ اللهُ عنه، بعدَ أبي مُوسى الأشعريِّ سَنةَ تِسعٍ وعِشرينَ، وضمَّ إليه فارِسَ بعدَ عُثمانَ بنِ أبي العاصِ، ثُمَّ ولَّاه الخليفةُ مُعاويةُ بنُ أبي سُفيانَ رَضيَ اللهُ عنه البصرةَ، ثُمَّ صَرَفَه بعدَ ثلاثِ سِنينَ، فتَحوَّلَ إلى المدينةِ حتَّى ماتَ بها سَنَةَ سَبعٍ، أو ثَمانٍ وخَمسينَ.
وفي هذا الحديثِ يَروي التَّابعيُّ مُصعَبُ بنُ سَعدِ بنِ أبي وقَّاصٍ أنَّ عبدَ اللهِ بنَ عُمَرَ رَضيَ اللهُ عنهما ذَهَبَ إلى عبدِ اللهِ بنِ عامِرٍ يَزورُه وهو مَريضٌ، فقالَ ابنُ عامِرٍ لعبدِ اللهِ بنِ عُمَرَ طالبًا منه الدُّعاءَ له: «ألَا تَدْعو اللهَ لي؟» وهذا من حُسنِ الظَّنِّ بابنِ عُمَرَ وطَلبِ الدُّعاءِ من الصَّالِحينَ، ومن أجلِ ذلك حَرَصَ على استِرضائه وطلَبِ دعائه في وقتِ الشِّدَّةِ والفزعِ إلى اللهِ تَعالَى، وهذا يُفسِّرُ ما ورَدَ عندَ أبي نُعيمٍ في مُستخرَجِه: «دَخَلَ ابنُ عُمَرَ على عبدِ اللهِ بنِ عامرٍ يَعودُه، فجعَلَ النَّاسُ يُثنُون على ابنِ عامرٍ، وابنُ عُمَرَ ساكِتٌ، فقالَ ابنُ عامرٍ: يا أبا عبدِ الرَّحمنِ، ما يَمنَعُك أنْ تَقُولَ؟» مِثلَ ما يَقولُ النَّاسُ بالثَّناءِ خيرًا.
فأجابَه ابنُ عُمَرَ رَضيَ اللهُ عنهما جوابًا فيه حِكمةٌ وعِظةٌ، فقال ابنُ عُمَرَ: «إنِّي سَمِعْتُ رَسولَ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّمَ يَقولُ: لا تُقْبَلُ» أي: لا تَصِحُّ «صَلاةٌ بغيْرِ طُهورٍ» وهو الوُضوءُ، فلا تُقبَلُ صلاةُ أحدٍ حتَّى يَتطهَّرَ بالماءِ بغَسلِ أعضائه الظَّاهِرةِ وُضوءًا تامًّا؛ فكلُّ مَن صلَّى بغَيرِ وُضوءٍ وهو مُحدِثٌ فإنَّ صَلاتَه غَيرُ صَحيحةٍ، ولا تُجزِئُ عنه، إلَّا مَن كانَ له عُذرٌ فيُجزئُه التِّيمُّمُ، ومَن تَعذَّرَ عليه التِّيمُّمُ كذلك لعُذرٍ، فلَه أن يُصلِّيَ حسَبَ استِطاعتِه؛ فلا يُكلِّفُ اللهُ نَفسًا إلَّا وُسعَها.
«ولا» يَقبلُ اللهُ تَعالَى «صَدَقَةً من غُلولٍ»، وهو ما سُرِقَ وأُخِذَ مِنَ الغَنيمةِ قبلَ أن تُقَسَّمَ، وسُمِّيَت بذلك لأنَّ الآخِذَ يغلُّ المالَ في مَتاعِه، أي: يُخفيه فيه، ويُطلَقُ على الخيانةِ مُطلَقًا، والمُرادُ منه هنا مُطلَقُ المالِ الحرامِ، أُخِذَ خُفيةً أو جَهرةً، ويَشملُ النَّهيُ كلَّ المالِ العامِّ.
ومُرادُ كَلامِ ابنِ عُمَرَ رَضيَ اللهُ عنه: فكَما أنَّ اللهَ لا يَقبَلُ مِنَ العِباداتِ إلَّا الطِّيبَ منها، والدُّعاءُ مِنَ العِباداتِ، وإنَّك يا ابنَ عامِرٍ لم تَسلَم في مُدَّةِ وِلايَتِكَ للبَصرَةِ وغيرِها من غَلِّ الأموالِ وتَبِعاتٍ من حُقوقِ اللهِ تَعالَى وحُقوقِ العِبادِ؛ فكيفَ يَقبَلُ اللهُ دُعاءَك؟! فقَصدُ ابنِ عُمَرَ بهذا الحديثِ زَجرُ ابنِ عامرٍ وحَثُّه على التَّوبةِ مِمَّا لَحِقَ به من ذُنوبٍ ومَعاصٍ قديمةٍ حتَّى بعدَ انقضاءِ زمانِها؛ فقد كانت وِلايتُه للبَصرةِ سَنةَ تِسعٍ وعِشرينَ، وماتَ سَنةَ سَبعٍ، أو ثَمانٍ وخَمسينَ.
وإذا كانَ ابنُ عُمَرَ شديدًا في هذا المَوقِفِ، فإنَّ الذي فعَلَه كانَ شِدَّةً في الحقِّ وتَوجيهًا لِما هو خيرٌ، ويَدفَعُ للعملِ، ويُحذِّرُ غيرَ ابنِ عامرٍ منَ الوُلاةِ، ويَغرِسُ في نُفوسِهمُ الخَوفَ، ويُحارِبُ رُكونَهم إلى الرَّجاءِ والطَّمعِ مع التَّهاوُنِ والمَظالِمِ، ولم يُرِدِ القَطعَ حقيقةً بأنَّ الدُّعاءَ للفُسَّاقِ لا يَنفَعُ؛ فلم يَزَلِ النَّبيُّ صلَّى اللهُ عليه وسلَّمَ والسَّلَفُ والخَلَفُ يَدعونَ للكُفَّارِ وأصحابِ المَعاصي بالهِدايةِ والتَّوبةِ، كما في الصَّحيحَينِ: «قَدِمَ طُفَيْلُ بنُ عَمْرٍو الدَّوْسِيُّ وأَصْحَابُهُ علَى النَّبيِّ صلَّى اللهُ عليه وسلَّمَ، فَقالوا: يا رَسولَ اللَّهِ، إنَّ دَوْسًا عَصَتْ وأَبَتْ، فَادْعُ اللَّهَ عَلَيْهَا، فقِيلَ: هَلَكَتْ دَوْسٌ، قالَ: اللَّهُمَّ اهْدِ دَوْسًا وَائْتِ بهِمْ».
وفي الحديثِ: عيادةُ المَريضِ.
وفيه: نصيحةُ العالِمِ للوُلاةِ والحُكَّامِ بالحِكمةِ والمَوعظةِ الحسنةِ.
وفيه: بيانُ فَضلِ الوُضوءِ.
وفيه: بيانُ فَضلِ الصَّدقةِ منَ المالِ الطِّيبِ.
وفيه: طَلَبُ الدُّعاءِ من أهلِ الصَّلاحِ والخَيرِ.
وفيه: بيانُ شِدَّةِ ابنِ عُمَرَ رَضيَ اللهُ عنهما في الدِّينِ، وقيامِه بالأمرِ بالمعروفِ، والنَّهيِ عنِ المُنكَرِ خيرَ قيامٍ، دُونَ مُجامَلةٍ.
وفيه: إشارةٌ إلى أنَّ تَناوُلَ الحرامِ ممَّا يَمنعُ قَبولَ الدُّعاءِ.